नगरकथा

नगरकथा

धूमिल

सभी दुःखी हैं

सबकी वीर्य-वाहिनी नलियाँ

सायकिलों से रगड़-रगड़ कर

पिंची हुई हैं

दौड़ रहे हैं सब

सम जड़त्व की विषम प्रतिक्रिया :

सबकी आँखें सजल

मुट्ठियाँ भिंची हुई हैं.

व्यक्तित्वों की पृष्ठ-भूमि में

तुमुल नगर-संघर्ष मचा है

आदिम पर्यायों का परिचर

विवश आदमी

जहाँ बचा है.

बौने पद-चिह्नों से अंकित

उखड़े हुए मील के पत्थर

मोड़-मोड़ पर दीख रहे हैं

राहों के उदास ब्रह्मा-मुख

‘नेति-नेति’ कह

चीख रहे हैं.

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